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मन पंछी है बहुत अकेला !

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मन पंछी है बहुत अकेला !
आगे रेला – पीछे मेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !
.
दिल के टुकड़े – टुकड़े कर के, एक – एक जर्रे को देखा,
शायद मिल जाए अपनापन, शायद मिले प्यार की रेखा,
मिली उलझनें, मिला झमेला,
मन पंछी है बहुत अकेला !
.
वक्त तमाचा जड़े गाल पर, अपने भी बेगाने होते,
दीपक की लौ मद्धम होती, दूर सभी परवाने होते.
समझ नहीं पाता यह खेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !
.
स्वर्ग-नर्क-धरती सब ढूंढा,पर्वत की चोटी पर देखा,
सागर की अथाह गहराई, मंदिर में-मस्जिद में देखा.
प्रेम नहीं, बस रेलम – रेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !
.
रिश्ते-नाते-प्रेमी-परिजन, सभी कारवां के हैं साथी,
जब था रहबर सभी साथ थे, बेटा-बेटी-पोते-नाती.
तम्बू सिमटा – उजड़ा मेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !
.
यह दुनिया तो रंगमंच है, स्वर्ग-नर्क हैं इसके परदे.
जर-जोरू-जेवर-जमीन में, जीवन भर हैं उलझे रहते.
मंजिल है मिटटी का ढेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !
आगे रेला – पीछे मेला !
मन पंछी है बहुत अकेला !



Tags: meerabai krishna  मीराबाई  मीराबाई कृष्ण  भक्ति शाखा  प्रमुख  कवयित्री  

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

vinitashukla के द्वारा
December 25, 2011

सुन्दर और मार्मिक रचना शशिभूषण जी. बधाई आपको.

roshni के द्वारा
December 22, 2011

शशि जी बहुत ही बढ़िया रचना .. दुनिया की भीड़ और एक अकेला मन ….. आभार

utpal के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय शशि जी एक उत्कृष्ट रचना ……. पढ़कर बहुत ही अच्छा लगा बधाई सादर

sadhana thakur के द्वारा
December 15, 2011

शशिभूषण जी ,बहुत सुन्दर रचना ,,,,,,,,,,,सच आज सब अकेला है ,भीड़ तो बहुत है ,पर है सब तनहा ………..

bharodiya के द्वारा
December 15, 2011

डॉ साहब नमस्कार मन पंछी अकेला आता है अकेला जाता है । कुदरत का नियम है । बीच का मेला तो झमेला है । ठहर ने का आनंद दिलाता है । आनंद मंजिल नही, उड जाना ही मंजिल है । ठहर ने का आनंद कुदरत ही छीनता है । बुढापा की तकलिफ से । उडान आसान बनाता है, अकेलेपन से । सोचता है क्या फरक पडता है रहुं या जाउं । ये नही सोचता मैं क्यों अकेला जाउं । आप की ज्ञान वर्धक कविता के लिये धन्यवाद । मैं ईसे दो दिन से अनझीप कर रहा था । आज कर पाया ।

nishamittal के द्वारा
December 15, 2011

शशि भूषण जी बहुत ही गहन विषय को रचना के माध्यम से व्यक्त किया है आपने धन्यवाद.

div81 के द्वारा
December 15, 2011

आदरणीय शशि भूषण जी, जीवन दर्शन कराती अर्थपूर्ण सार्थक रचना

allrounder के द्वारा
December 15, 2011

नमस्कार मान्यवर शशिभूषण जी, भले ही मन का पंछी अकेला हो किन्तु जे जे पर तो मेला ही मेला है फिर मन कहाँ अकेला है ? फिर से एक सार्थक रचना पर हार्दिक बधाई आपको !

alkargupta1 के द्वारा
December 15, 2011

शशि भूषण जी, जीवन दर्शन को दर्शाती उत्कृष्ट रचना यही तो जीवन का सत्य है जो सदैव ही अनबूझी पहेली की तरह है…

surendra shukla bhramar5 के द्वारा
December 15, 2011

प्रिय शशि जी नायब रचना ..बहुत प्यारी लगी …सच में मन पंक्षी ….चल उड़ जा रे पंछी …..ये दुनिया अब रहने के काबिल नहीं लगती …… भ्रमर ५ वक्त तमाचा जड़े गाल पर, अपने भी बेगाने होते, दीपक की लौ मद्धम होती, दूर सभी परवाने होते. समझ नहीं पाता यह खेला ! मन पंछी है बहुत अकेला ! कौन डाल पर बैठूं गाऊँ अब हरियाली नहीं रही पतझड़ सब कुछ हरता जाए कोयल कूक है कहा रही ??

sumandubey के द्वारा
December 15, 2011

शशी जी नमस्कार लग रहा है जैसे मेरी ही कविता को विस्तार दे दिया .

abodhbaalak के द्वारा
December 15, 2011

बहुत सुन्दर रचना सर मन रुपी पंछी को दर्शाती, ……….. http://abodhbaalak.jagranjunction.com/

minujha के द्वारा
December 15, 2011

कृष्णाश्री जी की बात का समर्थन करती हुं  अपने आप में अनूठी कविता बधाई हो शशिभूषण दी

krishnashri के द्वारा
December 15, 2011

आदरणीय नमस्कार , बहुत सुन्दर सूफियाना रंग लिए मस्त मौला ,कबीर की साखी की तरह जगाती हुई , उद्धव की कविता की तरह विराग लिए हुए ,जीवन के वास्तविक सत्य से रूबरू कराती पंक्तियों के लिए आपको ह्रदय से बहुत बहुत धन्यवाद .

Abdul Rashid के द्वारा
December 15, 2011

आदरणीय शशिभूषण जी आपको सादर नमन जिंदगी और जिंदगी की हकीक़त बयां करती लेख के लिए सप्रेम अब्दुल रशीद http://singrauli.jagranjunction.com/2011/12/11/मकई-का-दाना/

jlsingh के द्वारा
December 15, 2011

आदरणीय शशिभूषण जी, हार्दिक अभिनन्दन! आपने तो जीवन और संसार का निचोड़ ही प्रस्तुत कर दिया! यह दुनिया तो रंगमंच है, स्वर्ग-नर्क हैं इसके परदे. जर-जोरू-जेवर-जमीन में, जीवन भर हैं उलझे रहते. मंजिल है मिटटी का ढेला ! मन पंछी है बहुत अकेला ! आगे रेला – पीछे मेला ! मन पंछी है बहुत अकेला ! — साभार!

naturecure के द्वारा
December 14, 2011

आदरणीय डॉ. साहब, सादर अभिवादन ! बहुत सुन्दर यथार्थ को व्यक्त करती हुयी रचना ………बधाई !

Shailesh Kumar Pandey के द्वारा
December 14, 2011

आदरनीय शशिभूषन जी सादर अभिवादन ! बहुत सुन्दर कविता ……. कविता यथार्थ व्यक्त करती है बहुत अच्छा लगता है … —————————————————————————————————- यह दुनिया तो रंगमंच है, स्वर्ग-नर्क हैं इसके परदे. जर-जोरू-जेवर-जमीन में, जीवन भर हैं उलझे रहते. मंजिल है मिटटी का ढेला ! मन पंछी है बहुत अकेला ! आगे रेला – पीछे मेला ! मन पंछी है बहुत अकेला ! ——————————————————————————————— किन्तु पीछे छिपा नैराश्य मन की शून्यता बढाता है, पता नहीं क्यों?

December 14, 2011

 डॉ साहब आप तो पुरानी शराब की तरह चढ़ रहे हो भाई…..बहुत ही उम्दा रचना जितनी तारीफ की जाये उतनी कम…….बस बार बार पढ़ रहा हूँ……क्या बात है इन पंक्तियों मे “यह दुनिया तो रंगमंच है, स्वर्ग-नर्क हैं इसके परदे. जर-जोरू-जेवर-जमीन में, जीवन भर हैं उलझे रहते.मंजिल है मिटटी का ढेला !” जीवन की सच्चाई बता दी आपने ….साभार !!!

December 14, 2011

सचमुच बहुत सुन्दर रचना.. प्रशंसा मेरे बूते की बात ही नहीं है इस रचना के लिए.

anamika के द्वारा
December 14, 2011

बहुत ही सुन्दर व दिलचस्प कविता लिखा है अपने ….बढ़िया प्रस्तुति

Rajkamal Sharma के द्वारा
December 14, 2011

माई डियर शशिभूषण जी – एंग्रीयंगमैन – हेल्लो , हाऊ आर यू ! आज आपकी इस रचना ने निहाल करने के साथ मेरी आशाओं पर तुषारापात भी कर दिया है ….. बड़े ही दुःख के साथ लिखना पड़ रहा है कि लाख चाहने पर भी कोई कमी नहीं निकाल पाया ….. लेकिन घबराइए नहीं अगली बार ब्याज सहित दोगुणा ! ….. इस काबिले तारीफ रचना पर ढेरों मुबारकबाद :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-) :| :) :( ;) :o 8-)

Santosh Kumar के द्वारा
December 14, 2011

आदरणीय शशिभूषण जी ,.सादर नमन ऐसा लगा जैसे आपने खुद को व्यक्त कर दिया है ,…शायद मैं इस कविता पर कुछ लिखने लायक नहीं हूँ ,..इतनी सुन्दर रचना के लिए ह्रदय से आभार

minujha के द्वारा
December 15, 2011

क्षमा करेंगे जी के स्थान पर दी लिख दिया है गलती से

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय मीनू जी, सादर ! रचना आपको अच्छी लगी, बहुत बहुत आभार !

akraktale के द्वारा
December 15, 2011

शशिभूषण जी सादर नमस्कार, बहनजी की ही तरह मुझे भी कुछ ऐसा ही लगा.मगर मै ये नहीं समझ पा रहा हूँ की ये कांग्रेसी मन आप लोग कहाँ से ले आये हैं जो सर्वदल ( सारे ब्लोगरों) के बीच भी अकेलापन महसूस कर रहा है.हाँ आदरणीय राजकमल जी का मन हो तो समझ भी आये जो पांच पांच शादिया करके भी अकेला रह जाता है और एक शादी करने को बेताब रहता है वक्त तमाचा जड़े गाल पर, अपने भी बेगाने होते, दीपक की लौ मद्धम होती, दूर सभी परवाने होते. समझ नहीं पाता यह खेला ! मन पंछी है बहुत अकेला ! सदैव की भांति सुन्दर रचना सत्य का बोध कराती है.बधाई.

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय सुमन दीदी, सादर. यह आपका बड़प्पन है, बहुत बहुत आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय अशोक जी, सादर. क्या कांग्रेस का नाम ले के मन खराब कर रहे हैं. लेकिन बात आपकी गहरी है. वे भी आज अकेले ही हैं. उनसे तो हमलोग बहुत बेहतर हैं ! आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय संतोष भाई जी, सादर. “”"शायद मैं इस कविता पर कुछ लिखने लायक नहीं हूँ”"” यह लिखकर आप किनारे-किनारे से बच कर निकल रहे हैं और मुझे शर्मिन्दा कर रहे हैं. कोई बात नहीं, मेरा भी समय आयेगा !! बहुत-बहुत आभार.

Santosh Kumar के द्वारा
December 16, 2011

बिलकुल सही कहा आपने ,..इस गहरी रचना के किनारे से ही निकल पाया हूँ ,..डूबने का खतरा …लेकिन भावों ने सराबोर तो कर ही दिया ,…हार्दिक आभार सहित

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

बॉस, गुड मोर्निंग ! आई एम् फाइन ! आपके मनलायक एक रचना आज दे रहा हूँ. उम्मीद है, उसे कम से कम बकवास तो नहीं कहेंगे !! बिलकुल आपके मन लायक है !!!!!

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय अनामिका जी, सादर. बहुत बहुत धन्यवाद !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय टिम्सी जी, सादर. रचना अच्छी लगी, बहुत बहुत आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय डाक्टर साहब, सादर. क्या फूंक मार कर गुब्बारे कि तरह फुलाए जा रहे हैं. फट जाएगा !! आदरणीय भ्रमर जी और आदरणीय जवाहर जी को देखिये ! ये दोनों लोग छापामार गुरिल्लों कि तरह अचानक प्रकट होकर फिर लापता हो जा रहे हैं ? अन्दर कि बात पता नहीं लग रही है ? प्रतिक्रया के लिए आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

मान्यवर शैलेश जी, सादर. प्रतिक्रया के लिए आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय डॉ. साहब, सादर. रचना आपको अच्छी लगी, परिश्रम सार्थक हुआ ! प्रतिक्रया के लिए आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय सिंह साहब, सादर. क्या सूखी-सूखी प्रतिक्रया देकर जान छुडा रहे हैं. आपकी दो-चार लाइनों के बिना लगता है कि कुछ कहीं छुट रहा है ! सधन्यवाद !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय रशीद भाई, सादर! रचना आपको अच्छी लगी, मुझे उत्साहजनक प्रतिक्रया मिली, आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय कृष्ण श्री जी, सादर. वाकई यहीं हकीकत है ! जीवन का सत्य. प्रतिक्रया के लिए बहुत आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय अबोध जी, सादर ! कोई निर्देश नहीं, कोई सुझाव नहीं, इतनी संछिप्त प्रतिक्रया ! आपसे मैं निर्देशों कि उम्मीद किये रहता हूँ . आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय भ्रमर जी, सादर. “”"चल उड़ जा रे पंछी “”" आप तो उड़ के किसी फूल में जा बैठिएगा, हम कहाँ जा के बैठें ? इसपर भी कोई सुझाव दीजिये !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय अलका जी, सादर. सचमुच जीवन एक अबूझ पहेली है. प्रतिक्रया के लिए आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

मान्यवर सचिन जी, सादर ! ठीक कहा आपने, जे जे पर मेला ही मेला है, और उम्मीद है, आगे और भी अच्छा हो. बहुत बहुत आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय सादर. प्रतिक्रया के लिए बहुत बहुत आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय निशा जी, सादर ! उत्साहवर्धक प्रोत्साहन के लिए आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय भरोदिया जी, सादर. आप तो बस आप हैं, आप की प्रतिक्रया भी लाजवाब है ! “”सोचता है क्या फरक पडता है रहुं या जाउं । ये नही सोचता मैं क्यों अकेला जाउं ।”" दो-चार को साथ ले के जाऊं ! आपका बहुत बहुत आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

आदरणीय साधना जी, सादर ! आपलोगों की प्रतिक्रया से उत्साह बढ़ता है. बहुत बहुत आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 16, 2011

मान्यवर उत्पल जी, सादर. प्रतिक्रया के लिए आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
December 24, 2011

आदरणीय रौशनी जी, सादर ! सराहना एवं प्रतिक्रिया के लिए बहुत बहुत आभार !




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