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नर और नारी !

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नारी महान है !
नारी माता है !
नारी शक्ति है !
नारी ममता की मूरत है !
नारी अबला है !
नारी भोग्या है !
……इस तरह के अनेक वाक्य नारियों के सम्बन्ध में लिखे गए हैं ! नारियों को पुरुष द्वारा
प्रताड़ित किया जाता है, उन्हें दबाकर रखा जाता है, उनके साथ हिंसात्मक व्यवहार किया
जाता है, आदि पर अनेकों लेख और पुस्तकें लिखी जा चुकी हैं और लिखी जा रही हैं !
……परन्तु वास्तविकता क्या यही है ? क्या हम अपनी माता की इज्जत नहीं करते ? क्या
हम अपनी बहन को प्यार नहीं करते ? क्या हम अपनी बेटी से स्नेह नहीं रखते ? क्या हम
अपनी पत्नी को मारते-पीटते हैं ? क्या हम अपनी चाचियों, बुआओं, मामियों, फूफियों या
अन्य महिला रिश्तेदारों के साथ हिंसक, अभद्र या दोयम दर्जे का विचार रखते हैं ? क्या
हम अपने अडोस-पड़ोस की समस्त स्त्रियों को गलत निगाहों से देखते हैं ?
अगर ऐसा नहीं है तो फिर यह विलाप क्यों ? ऐसे लेखों द्वारा हम क्या बताना चाहते हैं ?
क्या हम महिला और पुरुष के मध्य उगे प्रेम के पौधे में गरम पानी तो नहीं डाल रहे हैं !
………मदर टेरेसा, इंदिरा गांधी, प्रतिभा पाटिल, कल्पना चावला, किरण बेदी या इन जैसी
उच्च कोटि के आदर्शों वाली महिलाओं को कौन प्रतिष्ठा नहीं देगा ? परन्तु यहीं प्रतिष्ठा अगर
भंवरी देवी, सन्नी लेओन या इस तरह की निम्नस्तरीय चरित्रवाली देहदर्शना और कुटिल
महिलायें भी चाहने लगें, और इसलिए की वे महिला हैं, तो यह कहाँ तक उचित होगा ?
………नारी का माता होना उसकी स्वयं द्वारा अर्जित कोई विशेषता नहीं है, बल्कि यह
प्रकृति द्वारा की गई व्यवस्था है ! कोई भी सृजन योग से होता है ! अकेला पुरुष और अकेली
नारी दोनों व्यर्थ हैं ! दोनों एक दूसरेके लिए आवश्यक हैं !
……..ऐसे एकतरफा लेख महिला-पुरुष के प्रेम की फुलवारी में आग ही लगाते हैं, उसे सींचते
नहीं ! नारी हमारे जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं ! न वे प्रताड़ित हैं, न दोयम दर्जे की हैं ! नारियों
के सम्मान की रक्षा के लिए पुरुष अपना सर तक कटा देते हैं !

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63 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Rodney Jurcik के द्वारा
March 29, 2017

Jan 22, 2017 – АлкоБарьер – эффективное средство, которое выводит токсины из организма и устраняет тягу к спиртному. Янтарная кислота и … pronews24.ru

Yon Vanzie के द्वारा
March 28, 2017

АлкоБарьер – эффективное средство, которое выводит токсины из организма и устраняет тягу к спиртному. Янтарная кислота и фибрегам в составе … pronews24.ru

Tillie Minari के द्वारा
March 22, 2017

The only song that lacks character is A/B machines. But the rest are all top notch balls to the wall awesome. I just want to rent out the biggest speakers they have, schlep them to a park and blast it, and watch the dance party ensue.

rabotaonline के द्वारा
March 5, 2017

Ищем людей для работы дома

onlinerabota के द्वारा
March 2, 2017

Ищем людей для работы не выходя из дома

yamunapathak के द्वारा
March 23, 2012

bahut hee sateek aur santultit vichaar

ajaydubeydeoria के द्वारा
March 12, 2012

आदरणीय शशिभूषण जी प्रणाम, हमारे धर्म ने, हमारी संस्कृति ने सदैव ही स्त्री को ऊँचा स्थान दिया है,पूज्यनीय माना है. हमारे शास्त्रों में भी वर्णित है. हमारे संस्कार भी ऐसे हैं. यह उपभोक्ता-वादी संस्कृति “जो हमारी संस्कृति पर हावी होती जा रही है” की देन है कि हमारे यहाँ भी स्त्री को भोग्या,अबला और सजावटी बनाने पर लोग तुले हुए हैं. इसका ही परिणाम है कि पूनम पाण्डेय,शर्लिन चोपड़ा और सनी लिओन चर्चा में हैं.

Kumar Gaurav के द्वारा
March 10, 2012

सादर प्रणाम शशिभूषण जी बिलकुल सही कहा अपने नर और नारी दोनों एक-दूसरे के पूरक होते हैं. हमारी भारतीय संस्कृति माँ सीता को आदर्श मानती है. यही हमारी पहचान है.

बनारसी बाबू के द्वारा
March 10, 2012

आदरणीय महोदय, नर एवं नारी के बीच प्रकृत्ति द्वारा प्रदत्त एक सहज संतुलन का समर्थन करता आपका लेख बहुत ही अच्छा है| हम भी आपसे सहमत हैं| सादर,

jlsingh के द्वारा
March 10, 2012

मेरी स्पष्ट राय यह है कि आपसी समझदारी से दाम्पत्य जीवन को सुदृढ़ किया जा सकता है. समाज में फैले विषैले कीटाणु को कठोर कानून और त्वरित फैसला से दूर किया जा सकता है. हमारे समाज में अनेकों उदहारण है जहाँ दोनों स्त्री पुरुष घर बाहर सामंजस्य बनाकर चल रहे हैं. महिलाओं को आगे आना होगा और पुरुषों को उन्हें सम्मानित नजरिये से देखना होगा. अभी कल ही एक नयी लड़की अर्चना चतुर्वेदी ने लिखा – हमें गर्व है कि हम लड़कियां हैं. मुझे बहुत अच्छा लगा. परमात्मा/प्रकृति ने हमें जिस रूप में भेजा है हमें उसी को सही साबित कर दिखाना होगा. रोने से कोई फायदा नहीं होने वाला. अपने हक़ के लिए लड़ना ही होगा और पुरुषों को भी अपना नजरिया बदलना पड़ेगा. इस चर्चा में हमारे मंच की सम्मानित महिला ब्लोग्गर्स को अवश्य भाग लेना चाहिए ताकि उनकी राय से कोई उचित हल निकल सके.! शशि जी और अन्य सभी विद्वानों का मैं आदर करता हूँ जिन्होंने इस चर्चा में भाग लिया है.! आभार!

minujha के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय शशि जी सुबह भी दो बार विचार प्रकट करने की मेरी कोशिश नाकामयाब रही,शायद अभी सफल हो जाउं,आपके आलेख से मै पुर्ण रूप से सहमत हुं कि किसी भी नारी के सम्मान का आधार सिर्फ उसका नारी होना नही हो सकता,हमें सरोजनी नायडु और फुलन देवी में फर्क करना आता है,और आज जब हम बराबरी की बात कर रहे है तो नर-नारी दोनों का महत्व अगले के लिए बराबरी का ही तो है… अच्छे आलेख की हार्दिक बधाईयां

mparveen के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय शशि जी तमाम गवाहों और सुबूतों को मद्दे नज़र रखते हुए हम ये कहना चाहते हैं कि महिलाएं कितनी भी सक्षम हो गयी हैं लेकिन आखिरी फैसला पुरुष कि मर्ज़ी से ही लेती हैं वो बाकि सुन्नी लियों कि तो बात ही अलग है और उसको बुरा सबने कहा है माना है लेकिन उसके चाहने वाले भी कम नहीं हैं अब वो चाहने वाले भी पुरुष ही हैं . खैर आपने अपने लेख में सब तःथ्य सही ही लिखे हैं कोई शक नहीं है लेकिन आप जैसे समझ के लोग नहीं हैं न समाज में , समाज में ऐसे भी लोग हैं जो सामने से तो पैर छूते हैं पर नज़रे कहीं और भी होती हैं मुह से इज्ज़त के शब्द बोलते हैं और दिल ही दिल में खा जाने वाले भाव भी रखते हैं उन कुत्सित लोगो से नारी को भय है …. बाकि सब तरह के उदहारण मिल जाते हैं समाज में कि फलां जगह पर नारी ने अपने ही पति का गला दबा दिया आदि आदि लेकिन सब तो एक जैसे नहीं हो जाते हैं . … नारी और नर दोनों ही समाज के अहम् हैं किसी के बिना समाज का निर्माण नहीं हो सकता तो बस कंधे से कन्धा मिलकर चलिए नारी को एक स्वच्छ समाज दीजिये ताकि उसको साथ चलने में कोई परेशानी ना हो … बस ज्यादा ना कहते हुए इतना ही कि नारी ने अपना भगवान् पुरुष को माना है तो पुरुष भी नारी को उचित सम्मान ही दे … कुछ गलत कहा हो तो क्षमा कीजियेगा .. सादर धन्यवाद…

Rajesh Dubey के द्वारा
March 9, 2012

नर और नारी प्रकृति की अनुपम रचना है. हम अपनी मां, बहन, बेटी सबको आदर देते है. अपनी मां से सुन्दर कोई नारी नहीं होती. लेकिन आज कल मां के ममता बहन के स्नेह की अनदेखी कर सौंदर्य प्रितियोगिता में नारी के रूप को देखा जा रहा है. रूप पर आधारित नर- नारी का संवंध सामाजिक विकृति का कारन है.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 9, 2012

बहुत अच्छी चर्चा हो रही है, उपुक्त रहेगा कि चर्चा व्यक्तिगत न लेकर सारगर्भित एवं स्रजनात्मक हो. ताकि एक निचोड़ निकले. अभी तक किसी महिला लेखक द्वारा चर्चा में भाग नहीं लिया गया है, पर होली कि गुझिया से ज्यादा ये राष्ट्र की सामाजिक समस्या पर चर्चा मैं आवश्यक समझता हूँ. चर्चा बोद्धिक और तथ्यात्मक, तर्क पूर्ण रहे. तो लाभ ज्यादा रहेगा, शुभ होली.

ashvinikumar के द्वारा
March 9, 2012

शशिभूषण जी नमस्कार ,,अपने लेख मे आपने बहुत ही संतुलित शब्दों मे वास्तविकता को दर्शाया है अच्छे सामञ्ज्स्य पूर्ण लेख के लिए हार्दिक आभार ,,परंतु यदा कदा समाचार पत्रों में छ्पने वाली घटनाएँ हृदय को विदीर्ण कर देती हैं और उन घटनाओं का एक मात्र कारण धनबल तथा कुत्सित वाशना ही होती है ऐसी तमाम घटनाओं के तमाम उदाहरण आप को समाचारपत्रों में निरंतर दिखते रहते हैं और यह सभी महिलाएँ निम्नस्तरीय चरित्रवाली देहदर्शना और कुटिल महिलायें शायद नही होती फिर भी इनके साथ ऐसी घटनाएँ हो जाती हैं शायद प्रत्युत्तर में यह कहा जाये कि किस देश ऐसी घटनाओं नही होतीं हर जगह आपराधिक प्रवित्ति के लोग होते हैं लेकिन महिला लगभग हर घटना में एक ही तरह की प्रताड़णा झेलती है इन हादशों की शिकार महिलाएँ की मनोदशा क्या होती है इसका हम केवल अंदाजा ही लगा सकते हैं और उनसे सहानुभूति ही प्रदर्शित कर सकते हैं लेकिन क्या वह महिला या कन्या पुनः सामान्य जीवन जी पाती है और पुरुष के प्रति ऐसी महिलाओं या कन्याओं का दृष्टिकोण क्या होगा ,,और अगर वस्त्रों की बात करें तो वैदिक काल में भी महिलाएँ न तो बुर्के में नही रहती थीं और न ही खुद को अंधी कोठरियों में कैद कर के रखतीं थीं ,, (संदर्भ ऋग्वेद के दसवां मंडल ) फिर भी मुझे यह कहने में कोई संकोच नही है कि जब भी किसी तरह की अस्थिरता समाज में आई उसका सबसे अधिक संत्रास महिलाओं को ही भोगना पड़ा वह भी वासनात्मक संत्रास के रूप में ही …………जय भारत

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय अशोक जी, सादर ! यह तो निर्विवाद है कि सृजन कि अंतिम परिणति माता द्वारा अर्थात नारी द्वारा ही होती है ! अब यहाँ गौर करने लायक बात है कि जबतक बच्चा अपने पैरों पर चलने लायक न हो जाय तबतक उसका अवलम्ब उसकी माता ही होती है ! वगैर माता कि देखभाल के लगभग तीन वर्षों का समय बच्चा नहीं गुजार सकता ! इस अवधि में माता का अधिकाँश समय व ध्यान उस बच्चे पर ही संकुचित रहता है ! उसके इस अवधि के सर्वाधिक क्रिया-कलापों का केंद्र-विन्दु वह बच्चा ही होता है ! और यह कार्य पुरुष कर भी नहीं सकता ! हाँ, इस अवधि में आवश्यक जरूरतों कि पूर्ति पुरुष पर निर्भर हो जाती है ! …….मुझे लगता है यह एक प्रमुख वजह है स्त्रियों के घर के अन्दर रहने की आवश्यकता का ! जिस परिवेश और परिस्थिति में कोई भी नर या नारी एक लम्बी अवधि तक रहता है तो वह उसका आदी हो जाता है ! वह अपने को उसके अनुकूल बना लेता है ! शायद यहीं सब वजहें हैं कि व्यक्ति बाहर दो-चार दिन तो बिता सकता है, भले ही वह उसके घर से अधिक सुविधायुक्त जगह हो, परन्तु जो सुख उसे अपनी उस जगह पर आकर मिलता है, जहां के लिए उसके दिमाग में यह बात बैठी है कि उसे एक लम्बे समय तक यहीं रहना है, वह और कहीं नहीं मिलता ! मैं यह नहीं कहता क नारियों को एक सीमा में कैद करना चाहिए, या उनपर अनेक तरह के बंधन लगाने चाहिए! ऐसा सोचना भी महामूर्खता है ! जीवन कि सुविधाओं के उपयोग का अवसर दोनों के लिए एक सामान होना चाहिए ! पर एक स्थापित व्यवस्था की जड़ें हिलाने का काम जिस प्रकार हो रहा है, वह भविष्य में क्या रंग दिखाएगा आप इसकी कल्पना करें ! …….नर हो या नारी – किसी को भी अपनी सीमाएं नहीं भूलनी चाहिए,क्योंकि हम एक स्वतंत्र इकाई होते हुए भी पूर्ण स्वतंत्र नहीं होते !

chaatak के द्वारा
March 9, 2012

स्नेही शशिभूषन जी, सादर अभिवादन, आपकी इस पोस्ट में बहुत कम शब्दों में बहुत ही सटीक और सही बात लिखी है और मैं इसके हर शब्द का समर्थन करता हूँ| अच्छे लेख पर हार्दिक धन्यवाद!

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 8, 2012

हे नारी शक्ति अलक जगा ये देख तेरा अस्तित्व गिरा है, तुझको हम पूजा करते थे पर तेरा स्वरुप गिरा है, उठना होगा क्यूंकि तेरे ही दम पर संसार टिका है, जनमानस की शक्ति और जीवन मूल्य आधार टिका है, गर तुने “नवीनकरण” को नग्न अवस्था तक पहुंचाया, तो देख तेरा खुद का बेटा भी तुझे बेचने को है आया, तुझे खुदी के सोच से देखो आगे बढ़ कर लड़ना होगा, कामरूप लोगों को तेरी तेज रूप से डरना होगा, जो तुने बस ठान लिया फिर देख छटा क्या आती है, बदनाम कर रहे तंत्र को तू कितनी पीड़ा पहुंचाती है, नारी तू फिर नारी बन जा और हमें कोमलता देदे, इसके लिए तू चाहे तो सृष्टि से अधिकार भी लेले”…………. आदरणीय सर को सादर प्रणाम ……… बहोत ही उत्कृष्ट लेख आपका………..मेरा पूरा समर्थन आज देश किधर जा रहा है ये नारी शक्ति को ही सोचना पडेगा …………..यदि हम सन्नी लेओन और पूनम पांडे जैसे स्त्रियों का विरोध खुल कर नहीं करेंगे और नारी उसका खुल कर समर्थन नहीं करेगी तब तक नारी को अपना स्वरूप नहीं मिलेगा………..आधुनिक होने की परिभाषा बनाने की आव्य्सक्ता है ………….आपको समष्ट परिवार सहित होली मुबारक

jlsingh के द्वारा
March 8, 2012

आदरनीय शशि जी, सादर अभिवादन! आपकी सोच सही है और आपने सही विश्लेषण भी किया है. पर नीचे अशोक जी ने भी कुछ सवाल उठाये हैं वह भी विचारणीय है. हर विचार या सोच के दो पहलू होते ही हैं. उद्धत पंडित आर. के. राय और दिनेश आस्तिक जी ईश्वर के अस्तित्व पर तर्क वितर्क कर रहे हैं इधर आप और अशोक जी. ये विचार धारा और उसके अनुरूप आचरण दोनों अलग अलग हो सकते हैं. मैं भी तर्क विद्या में पारंगत नहीं हूँ, इसलिए इतना ही कह सकता हूँ – “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी!” सतत सुधार दोनों तरफ से जरूरी है……..

akraktale के द्वारा
March 8, 2012

आदरणीय शशिभूषण जी सादर नमस्कार, आपने जिस अस्त्र का उपयोग कहीं किया था आज शायद वो उलटा आप पर ही चल गया है.खैर, आपने दो चित्रों में प्रश्न किया है किसकी इज्जत करें?मुझे तो लगता है की आपको सिर्फ उसी की इज्जत करना है जो उसके काबिल है क्योंकि दुसरे की इज्जत तो अपने आप है क्योंकि उससे तो खुदा भी डरता है. नारी को दी गयी सभी उपमाएं सत्य हैं और ये भी सत्य है की हम अपने परिवार में नारी को बहुत सम्मान देते हैं. बल्कि यूँ कहें की आज हमारी कोशिश है की वह हमारे कदम से कदम मिला कर चले. मगर सत्य के लिए हम जब वृहत समाज पर नजर डालते हैं तो हमें नारी की घर में रोटी बनाने वाली, बच्चों को खिलाने वाली,सर पर डेढ़ हाथ का पल्लू लेने वाली छवि क्यों नजर आती है? क्यों नारी ही पति के घर डोली में बैठकर जाती है? क्यों पति के कहने पर नारी अच्छी भली नौकरी छोड़कर घरेलु कामो में व्यस्त हो जाती है? क्यों देर रात नारी का घर लौटना हमें पसंद नहीं?क्यों नारी को ही सती होना पडा था? क्यों नारी को ही अग्नि परीक्षा देना पडा? क्यों कुल की मर्यादा सिर्फ नारी से ही जाती है? और आज भी लोकतंत्र के सर्वोच्च मंदिर में कोई बराबरी के लिए नहीं मात्र तैंतीस प्रतिशत के लिए भी वर्षों से महिलाओं को लड़ना पड़ रहा है? कोई तो कारण है अधिक ना सही थोड़ा विलाप तो होगा ही. विषय बड़ा है. फिरभी कम को ही पूरा समझे, आज महिला दिवस पर भी हम महिलाओं के हक़ के लिए नहीं बोले तो फिर सर कटाने से भी कुछ नहीं होगा. गलती हो तो क्षमा करें. शुक्रिया.

dineshaastik के द्वारा
March 8, 2012

शशिभूषण जी सराहनीय एवं साहसिक आलेख के लिये बधाई……

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 8, 2012

आदरणीय शशि महोदय जी. सादर अभिवादन निश्चय ही एक तरफ़ा लिखा जाता रहा है. बधाई शुभ होली.

vikramjitsingh के द्वारा
March 8, 2012

प्रिय शशि जी, सादर, अति उत्तम और विचार करने योग्य……रचना की बधाई….

Abdul Rashid के द्वारा
March 8, 2012

आदरणीय शशि जी नमस्कार होली की हार्दिक बधाई सुन्दर रचना पे सुन्दर रचना और उसका आधुनिकरण सप्रेम अब्दुल रशीद http://www.aawaz-e-hind.in

RAJEEV KUMAR JHA के द्वारा
March 8, 2012

अभी भी कमेंट्स की समस्या हो रही है,जे.जे. पर.सुन्दर आलेख आदरणीय शशि जी.स्थिति का सही आकलन है.

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय प्रदीप जी सादर ! ऐसे बच के निकलने से कैसे होगा ? इस विषय पर आपकी भी पोस्ट की उम्मीद कर रहा हूँ ! समर्थन भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय झा जी सादर ! ऐसे बच के निकलने से कैसे होगा ? इस विषय पर सभी लोगों को विचार करना आवश्यक है ! समर्थन भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 8, 2012

आदरणीय अशोक जी, सादर ! आप अपनी प्रतिक्रया पर पुनः एक बार विचार करें ! अपनी सामाजिक व्यवस्था, अपनी संस्कृति, अपने देश का गौरव जिसकी चर्चा करते हम नहीं अघाते, को ध्यान में रखते हुए विचार कीजिये ! इस बात को ध्यान में रखते हुए विचार कीजिये कि वास्तविक स्थिति क्या है, यह भी ध्यान में रखकर कीजिये कि जहां भी “नारी स्वतन्त्रता” के नाम पर स्वच्छंदता हुई है वहाँ के लोग भारत आकर आपकी संस्कृति से शिक्षा ले रहे हैं, इस बात को भी ध्यान में रखकर विचार कीजिये कि जिन देशों में नारी सम्पूर्ण स्वतंत्र है, उन्हीं देशों में बिना व्याह के माता बनने वाली बच्चिया भी ज्यादा हैं ! अगर वैसी ही स्थिति को हम अपने यहाँ लाना चाहते हैं तो फिर तो मेरी बात का कोई मतलब ही नहीं ! नारी के लिए बस एक ही सबसे कमजोर विन्दु है कि माता उसे ही बनना है ! वह भी एक लम्बे समय के बाद और इस प्रक्रिया को छुपाया भी नहीं जा सकता ! अगर यह प्रक्रिया शीघ्र और बिना किसी कि सहायता के हो जाने वाली होती तो निश्चित रूप से परिदृश्य कुछ और होता ! लेकिन यह प्रकृति प्रदत्त व्यवस्था है ! हम आप क्या कोई इसे नहीं बदल सकता ! इन सब परिस्थितियों को ध्यान में रखकर आप पुनः एक बार गौर करें ! आप क्यों नहीं सोच रहे हैं कि जो परिस्थितियाँ इस बात कि आड़ में पैदा करने कि कोशिश कि जा रही है, वह समाज को किन अतल गहराइयों में ले जायेगी !

ANAND PRAVIN के द्वारा
March 8, 2012

आदरणीय अशोक सर, सादर प्रणाम बड़ों की बातों में छोटों को नहीं बोलना चाहिए फिर भी बोल रहा हूँ……..इसके लिए क्षमा दो तरह के पक्ष होते है जीवन में एक …………..हम कमजोर को सताते है………..और दुसरा कमजोर हमको सताते है…………… पहला जो पक्ष है वो नारी की वास्तविक व्यथा है जिसे हमें …….मूल रूप से दूर करने की आव्य्सक्ता है क्यूंकि समाज में नारियों के लिए समास्याओ से इनकार नहीं किया जा सकता………… किन्तु दुसरा जो पक्ष है वो बढ़ा ही टेढा है………सुनने में भी और व्यवहारिक जीवन में भी …………. जब हम मर्दों को समाज का सबल पक्ष कहते है तो निश्चय ही नारी दुर्बल पक्ष है किन्तु शशि सर ने जो नारी का दुसरा स्वरूप दिखाया है वो सबल है या दुर्बल ये कहना बहोत ही मुश्किल है……….आज कम कपडे पहन लेना और स्टायलिश बाते करना या अभद्रता ही आधुनिक शैली बन गई है………कोई माने या ना मने…….यदि समाज के कुछ आच्छे परम्परा को तोडना ही आधुनिकता है तो ……………..ऐसी आधुनिकता को हम ढकोसला ही कह सकते है और एक प्रकार की ब्लाक्मेलिंग………जो की मैं कहना चाह रहा था ………….. कहने के लिए बहोत बड़ी बात है……….किन्तु ज्यादा बोलना अपराध होगा……….आपको होली मुबारक

akraktale के द्वारा
March 9, 2012

सादर क्षमा याचना सहित, मैंने कभी नहीं कहा की हम विदेशी संस्कृति की बुराइयों का अनुकरण करें.अवश्य ही मेरी पूर्व प्रतिक्रया में कुछ त्रुटियाँ हो सकती है, विषय ही ऐसा है.मै अपनी संस्कृति से दमित भी नहीं हूँ. हमारी संस्कृति व्यापक है किन्तु उस को पुरुष अपने हिसाब से लागू करते हैं. आप देख सकते हैं क्षेत्रवार संस्कृति की भिन्नता.मगर सब जगह पुरुषवाद की छाप दिखती है एकाध प्रदेश को छोड़ दें तो. अब हम बच्चियों को पढ़ाते तो खूब हैं किन्तु क्या हमें ख़ुशी होगी की जब पी एच डी करने के बाद भी उसे ससुराल में सिर्फ किचन के काम का ही अधिकार हो या इस बात से प्रसन्न हों की वह अपने नर्सरी के बच्चों को शिक्षित होने के कारण पढ़ा पा रही है. माता को सिर्फ जननी के रूप में देखना है तो अवश्य ही वह प्रकृति प्रदत्त माता है. आज के विज्ञान को छोड़ दें तो प्रकृति अब इसमें कोई बदलाव भी नहीं ला सकती, किन्तु हम इंसान हैं सोच है हमारे पास.हम जननी का यह कह कर उपहास नहीं कर सकते की इश्वर ने तुझे ऐसे ही बनाया है तो भुगत हम क्या करें. नहीं, करने को बहुत कुछ है मगर समाज का बड़ा वर्ग उससे अपने स्वार्थ की खातिर बचता आया है.इश्वर ने अवश्य ही कुछ सोच कर महिला को ऐसे गढा होगा.वरना तो हमारा भी जन्म अंडे से हो सकता था. करने को बहुत है मगर सर्वप्रथम सकारात्मक सोच की आवश्यकता है.धन्यवाद.

akraktale के द्वारा
March 9, 2012

प्रिय आनंद जी, सही कहा आपने आपको बोलना नहीं है, आपको निर्णय लेना है क्योंकि हम तो जिन्दगी के अंतिम पड़ाव की और अग्रसर हैं.आपके सामने भूत और भविष्य दोनों खड़े हैं अब निर्णय आपको करना है की भूत के साथ रहना है या कि अच्छे भविष्य का निर्माण करना है.धन्यवाद.

March 9, 2012

गुस्ताखी माफ़….. दोनों गुरु और शिष्य के विचार एक तरफ है तो मैं सोचा मैं आपके विचारों के तरफ हो जाऊ, जो कि विचारणीय और प्रशंसनीय के साथ-साथ अनुकरणीय भी है. वैसे भी हम सच से कबतक मुंह मोड़ते फिरेंगे……..यक़ीनन हमारी भारतीय संस्कृति महान और अनुकरणीय है पर हम भारतीय नहीं. यदि हमारी भारतीय संस्कृति महान है तो हम कहते क्यों फिरते है? वो हमारे आचरण और समाज में दिखना चाहिए. मित्र मैं तुम्हारे, पिता श्री और कुछ चन्द लोगों की बात नहीं कर रहा हूँ . मैं पुरे भारतीय समाज की बात कर रहा हूँ…..जिसमे मैं भी हूँ. मैं चाहता हूँ कि हमारे तुम्हारे बीच वाकयुद्ध शुरू हो क्योंकि यही समय और परिस्थिति कि मांग है….इसलिए अब तुम अपनी बात रखों, मुझे मित्र समझकर नहीं बल्कि जो तुम सही समझते हो………

March 9, 2012

जो बाहर से लोग भारतीय ग्रंथों और संस्कृति का अध्ययन करके प्रभावित हो रहें है, १५-२० साल हमारे समाज का हिस्सा बन जाये सब हकीकत सामने आ जाएगी… हम भी भरतीय संस्कृति और सभ्यता के पक्षधर है और रहेंगे…….पर यहाँ जब वास्तविकता कि बात हो रही है तो किताबों और ग्रंथों से बाहर निकलकर कर देखिये फिर शर्म से मर जायेंगे….

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

मान्यवर अनिल जी, सादर ! समस्या के कारण खोजिये ! उनका हल सुझाइए ! शुभकामनाएं !

March 10, 2012

पिता श्री, आप से विनती है कि एक बार अपने आलेख और अपने कमेन्ट, दोनों में तुलनात्मक विश्लेषण कीजिये,…फिर आप अपनी बात रखिये कि क्या वास्तव में दोनों विचार धाराएँ एक पक्ष में है. आपने समस्या के समाधान कि बात कहें, बहुत अच्छा लगा……..आपके सामने एक समस्या रख रहा हूँ व्यक्तिगत मत लीजियेगा कि कोई हमारी बेटी या बहन किसी लड़के से शादी करना चाहती है, जो हर दृष्टि से उसके लायक है……आपका समाधान क्या होगा और क्यों होगा? चूँकि वास्तविकता कि बात हो रही है तो बिना सजीव उदहारण के लगता है कि इसका समाधान नहीं समझ में आएगा. यदि यह बुरे है तो मैं जानना चाहूँगा कि अच्छाई क्या है? और दूसरी बात एक बाप अपनी बेटी का उसकी मर्जी के खिलाफ शादी कर रहा है…..इसका समाधान क्या होगा?…यदि यह अच्छाई है तो बुराई क्या होगा? यदि इन दोनो परिस्थितियों में दो दिल गलत कदम उठा बैठते है तो ………अपनी बात रखिये ताकि आगे का वार्तालाप चालू हो सके…. मित्र प्रवीन, बेहतर होगा कि इस वाकयुद्ध का बागडौर तुम सम्भाल लो क्योंकि एक पुत्र होने के नाते ( भले ही मुझे आजतक वो पुत्र के रूप में स्वीकार नहीं किये है) मैं हमेशा उनके ह्रदय के पास रहता हूँ जिसके कारण मैं उस ऊचाई से जो देख रहा हूँ, वो देखना नहीं चाहते और न ही अपनी बात स्पष्ट रूप से रखना चाहते है. तभी तो मेरे कमेन्ट को यह कहकर नज़रंदाज़ कर दिए कि मुझे इसपर गहन मंथन कि आवश्यकता है………साथ में अपने गुरु जी से विजयी भवः का आशीर्वाद ले लेना क्योंकि मैं तो हारने वाला नहीं हूँ मैं एक विचार हूँ जो कभी हार नहीं सकता. मैं अलीन भी हूँ और प्रवीन भी….इसलिए मेरी जीत तो हर हाल में निश्चित है…..परन्तु यदि तुम इस वाकयुद्ध में नहीं उतरे तो यह एक गुरु की हार होगी और सत्य की भी और बहुत से लोग एक बार फिर इस ज्वलंत समस्या के समाधान से महरूम हो जायेंगे……..एक ब्लॉगर की बहुत दिनों के बाद इस मंच पर वापसी हुई जिसे मैं अभी तक नहीं जानता था. पर मैं चाहूँगा कि एक बार उस व्यक्ति के आलेख पढ़े और साथ ही मैं उस आलेख से जो अंश अपने कमेन्ट में पोस्ट किया हूँ उस पर नज़र डालें फिर उसके बाद समाज कि वास्तविकता पर बात किया जय तो बेहतर……अंत में……………. सत्यमेव जयते…

March 9, 2012

पिता श्री, सादर चरण स्पर्श! आप जो उच्च कोटि कि महिलायों का उदहारण दिए है उस बात से मैं इनकार नहीं करूँगा. परन्तु समाज के हकीकत से आप जुरूर इनकार कर रहें. यदि ऐसा नहीं है तो फिर कन्या भ्रूण हत्या क्यों, दहेज़ प्रथा जैसी घटनाएँ, क्या यह उच्च कोटि के उदहारण है? मेरे जेनरेशन के लोग महिलाओं को छेड़ते तो है साथ में आपके जेनरेशन के लोग बेटी और बहु समान नारी के साथ क्या-क्या कर रहें, यह बात छुपी नहीं है. क्या यह उच्च कोटि का उदहारण है? अब आप कहेंगे कि सब पश्चिमी सभ्यता के कारण जो महिलाओं में बदलाव हुए है उसके कारण यह सब हो रहा है. परन्तु यह पश्चिमी सभ्यता जब हावी नहीं था, उस समय भी यह समाज का स्वरुप कैसा था किसी से छुपा नहीं है.जो आपने महिलाओं के सम्मान में बातें रखे है उसका खंडन नहीं हो रहा है. पर जिस वास्तविकता कि आप बात कर रहें है उसका खंडन हो रहा. हम सभी एक नारी को कितना सम्मान देते है यह बात छुपी नहीं है. अच्छा होने और अच्छा बनने में बहुत अंतर है……

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

मान्यवर आनंद जी एवं अनिल जी, यह सब अगली पीढ़ी के ही काम आयेगा ! नीचे आदरणीय अशोक जी ने लिखा भी है ! इसपर गहन मंथन करें तब अपने विचार रखें ! स्वतंत्र रूप से पोस्ट के रूप में ! बहुत बहुत शुभकामनाएं !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय अश्विनी जी, सादर ! आपने लिखा है कि …….. “जब भी किसी तरह की अस्थिरता समाज में आई उसका सबसे अधिक संत्रास महिलाओं को ही भोगना पड़ा वह भी वासनात्मक संत्रास के रूप में ही !”"” . मैंने भी इस बात पर काफी सोच-विचार किया है, परन्तु इसका सही विश्लेषण करने में असमर्थ रहा ! अगर इस प्रश्न का हल मिल जाय तो इस गुत्थी को बहुत हद तक सुलझाया जा सकता है ! व्यक्तिगत रूप से या अपवादों को छोड़ दिया जाय तो मैंने भी ऐसा कहीं नहीं पाया है कि स्त्रियों द्वारा पुरुषों को सामूहिक रूप से संत्रस्त किया गया है ! तो फिर क्या वजह है कि शिकारी पुरुष है और शिकार स्त्रियाँ ! उन कारणों या परिस्थितियों का विश्लेषण होना चाहिए ! किसी बीमारी को लेकर हायतौबा मचाने से अच्छा है कि हम उस बीमारी के कारणों और तत्पश्चात उसके निदान पर विचार करें ! इस पोस्ट का मेरा उद्देश्य भी यहीं है ! हमें यह जानने का प्रयत्न करना चाहिए कि ऐसी परिस्थितियों कि वजह क्या है ? क्यों नारियां अपने को असुरक्षित महसूस करती हैं ! क्या वे शारीरिक रूप से दुर्बल होती हैं, क्या उनके मस्तिष्क में हीन भावना है, या क्या वे पुरुषों से आत्मिक प्रतिशोध लेना चाहती हैं ? अपवादों को छोड़ दिया जाय तो आज के परिवेश में जिदगी की गाडी को सुचारू रूप से चलाने में दोनों अपनी जिम्मेदारी का निर्वाह सामान रूप से कर रहे हैं ? कोई भी कार्यक्षेत्र हो, नर और नारी दोनों समान रूप से अपना योगदान कर रहे हैं, तो फिर अंतर कहाँ है और अंतर है तो क्यों है ?

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय प्रदीप जी, सादर ! मेरी भी यही मंशा है कि इस प्रश्न का एक सार्थक विश्लेषण किया जाना चाहिए ! इस चर्चा में पुरुष या महिला का कोई अर्थ नहीं है ! मेरा उद्देश्य यह है कि वर्तमान दौर में जो नारी सशक्तिकरण और नारी स्वतन्त्रता कि चर्चा हो रही है और वह जिस दशा और दिशा में कि जा रही है, उसके परिणामों पर विचार हो ! अखबारों में छपी कुछ घटनाओं के आधार पर नारियों के स्वाभिमान की ओट लेकर हमारे इस विशाल जनसमाज को जिस रास्ते पर धकेला जा रहा है, वह हमें किन अंधेरों में ले जाएगा उसपर विचार करने कि बात है ! कहीं नारियां फिर से तो नहीं छली जायेंगी ! नर और नारी जीवन-रथ के दो पहिये हैं ! संसार-चक्र कि धूरी हैं ! दोनों के बीच का संतुलन ही सुखकारी होगा ! प्रकृति ने हमें दो हाथ दिए हैं ! दोनों सामान हैं, पर दोनों कि उपयोगिता अलग-अलग है ! दोनों एक दुसरे के पूरक हैं, परन्तु फिर भी दोनों में कुछ अंतर है ! हम दोनों हाथों का उपयोग करते हैं, परन्तु भिन्न-भिन्न तरीकों से ! भोजन का कौर अगर दाहिने हाथ से खाते हैं तो पानी प्रायः बाएं हाथ से पीते हैं ! कलम अगर दाहिने हाथ में पकड़कर लिखते हैं तो कागज़ को बाएं हाथ से पकडे रहते हैं, ताकि वह हिले नहीं ! मैं जिस तथ्य की ओर इशारा करना चाहता हूँ, हो सकता है मैं समझा नहीं पा रहा हूँ ! मेरा उद्देश्य मात्र यह है कि सुखी जीवन, सुखी समाज और सुन्दर व्यवस्था के लिए प्रयत्नशील रहना चाहिए, न कि गलत विचारधारा वाले विदेशियों के जाल में फंसकर अपने सुखी समाज में आग लगा लेनी चाहिए !

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 9, 2012

निश्चित तौर पर एक दूसरे के पूरक हैं. ऐसा रास्ता और छवि प्रस्तुत की जानी चाहिए कि महिलाएं कैसा शसक्तीकरण चाहती हैं. इसमें कौन बाधक है. अपवाद तो हर जगह हैं. पर अधिकांश को ध्यान में रखते हुए सार्थक चर्चा और उसके निष्कर्ष सामने आयें. तभी समय का सदुपयोग होगा. सादर भैया जी .

shashibhushan1959 के द्वारा
March 10, 2012

आदरणीय प्रदीप बाबा, सादर ! ये दो-दो लाइन की प्रतिक्रया लिखने से काम नहीं चलेगा ! इस विषय पर आपके विचार भी पोस्ट होने चाहिए ! ——————————————————— अभी भांग उतरी नहीं है क्या ? मैं आपका भैया कबसे हो गया ? मैं तो आपका भाई हूँ, भैया तो आप हैं ! सादर !

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 11, 2012

आदरणीय शशि जी, सादर अभिवादन . मैं तो आपका भाई हूँ, भैया तो आप हैं ! भाई एवं भैया में मैं अंतर नहीं जान पा रहा हूँ, अंतिम रूप से सहमत/निर्णय होने तक इस्टे लिया है . मार्गदर्शन कृपया.

sadhana thakur के द्वारा
March 9, 2012

शशिभूषन भाई ,बिलकुल सही कहा आपने ,,लेकिन कभी -कभी कुछ कडुवे सच के कारण बातें तो बनती ही है ……….

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय परवीन जी एवं आदरणीय साधना जी, सादर ! आपलोगों की प्रतिक्रया पाकर मैं अभिभूत हो गया ! मन के किसी कोने में आशा की एक लौ टिमटिमा रही थी ! मुझे पूर्ण विश्वास था कि आप प्रबुद्ध महिलायें भी इस मुद्दे पर निष्पक्ष रूप से विचार करेंगी ! मेरे विचार को संबल देने के लिए आभार ! लेकिन असल बात मैं अब कहने जा रहा हूँ ! मेरे विचार से इन विन्दुओं को ध्यान में रखकर एक सार्थक बहस होनी चाहिए ! उत्तेजनापूर्ण या एकतरफा बातों से सिवाय बेचैनी के और क्या हासिल होगा ? इस समस्या कि जड़ क्या है ? क्या कारण है कि महिलायें स्वयं को असुरक्षित महसूस करती हैं ? उनके साथ हिंसक अपराध होते हैं तो क्यों और किन परिस्थितियों में होते हैं ? कन्या भ्रूण ह्त्या हो रही है तो इसमें पुरुष के साथ महिलाओं की भागीदारी की भी चर्चा होनी चाहिए ! इनको कैसे दूर किया जा सकता है ? इन सब मुद्दों पर एक चर्चा होनी चाहिए ! पूर्वाग्रह या वर्गभेद भुलाकर चर्चा होनी चाहिए ! अपने जनसमाज के विशाल परिवेश, महिलाओं के निवास कि विभिन्न स्थितियों आदि को ध्यान में रखकर चर्चा होनी चाहिए ! इस चर्चा में सभी को भाग लेना चाहिए! बहुत बहुत आभार !

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
March 9, 2012

धन्यवाद आप लोग चर्चा में आये. सवाल इस बात का नहीं है कि स्त्री पुरुष का स्वभाव कैसा है, एक दूसरे के प्रति . सवाल ये है कि जो बीत गया है उसमे तथा बीते हुए के गुण दोषों को लेकर आगे क्या किया जाये. कि नारी शसक्त हो. शाश्क्तिकरण का अभिप्राय क्या है. क्या होना चाहिए, कैसे किया जाये. इसप्रकार आप लोग सार्थक विचार देने का कष्ट करें. छोटी बातों को न रखकर दिशा निदेशक के रूप में प्रस्तुति हो तो ज्यादा लाभकर होगी. सादर .

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय प्रदीप जी, मेरी बात को समझाकर रखने के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय अब्दुल भाई, सादर ! आप कहाँ अदृश्य हो गए हैं ? हम पर भी कृपाभाव बनाए रहें ! इस विषय पर आपकी भी पोस्ट की उम्मीद कर रहा हूँ ! हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय विक्रम भाई, सादर ! ऐसे बच के निकलने से कैसे होगा ? इस विषय पर आपकी भी पोस्ट की उम्मीद कर रहा हूँ ! प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय दिनेश जी सादर ! इस विषय पर सभी लोगों को विचार करना आवश्यक है ! समर्थन भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय जवाहर भाई, सादर ! ऐसे बच के निकलने से कैसे होगा ? इस विषय पर सभी लोगों को विचार करना आवश्यक है ! समर्थन भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय चातक जी, सादर ! ऐसे बच के निकलने से कैसे होगा ? इस विषय पर सभी लोगों को विचार करना आवश्यक है ! समर्थन भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय राजेश भाई, सादर ! ऐसे बच के निकलने से कैसे होगा ? इस विषय पर सभी लोगों को विचार करना आवश्यक है ! समर्थन भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

akraktale के द्वारा
March 9, 2012

आदरणीय भाई साहब, बिलकुल सार्थक बात है नर नारी के आपस में सामंजस्य में ही सफलता है.समाज का जो वर्ग नारी को दहेज़ जैसी बातों के लिए प्रताड़ित करता है.वह प्रताड़ना बंद करे.जो पुरुष पत्नी को गैर कमाऊ सदस्य समझ कर बार बार छोड़ देने की धमकी देता हो वह बंद करे,समाज विधुर को जिस मांगलिक कार्यक्रम में शिरकत करने की अनुमति देता हो वहां विधवा के शामिल होने में भी परहेज ना करे. मैंने तो अपनी पत्नी को समझा दिया है की आदरणीय शशि जी के अनुसार हमारा सामंजस्य इसी मै है की तू खाना बना और मै नौकरी करूँ.पत्नी ने भी सहमति दे दी है की जब मैंने आपकी एक बात नहीं सुनी तो नौकरी करके किसी और की चार बातें सुनने क्यों जाऊं. हमारी गाडी तो चल पड़ी है.शुक्रिया.

shashibhushan1959 के द्वारा
March 10, 2012

आदरणीय अशोक भाई, सादर ! लगता है आप मेरी बातों का बुरा मान गए ! अगर ऐसा है तो मुझे बहुत खेद है ! हो सकता है मैं अपनी बात समझा नहीं पा रहा हूँ ! क्षमाप्रार्थना !

akraktale के द्वारा
March 10, 2012

आदरणीय शशि जी प्रणाम, लगातार चलता वाद, विवाद ना बन जाए इसलिए इतना व्यंग तो बनता ही है.संयुक्त परिवार में ख़ुशी ख़ुशी रहता हूँ आप ही मूल्यांकन करें बुरा मानने के लिए दिल में कोई जगह हो सकती है भला. मै पूर्णतया आपकी बात को समझ रहा हूँ जो आप कहना चाह रहे हैं कि आधुनिकता के फेर में मिलाएं फिर ठगी ना जाएँ जो महिलाओं के साथ ही समाज के लिए भी घातक हो. अवश्य ही आपकी दुर्द्रष्टिता प्रकट करता है.किन्तु पीढ़ियों से दमन का शिकार नारी मौका हाथ लगते ही आगे निकलने को बेकरार है और क्यों ना हो.मगर यहाँ भी पुरुषों को उनकी मदत करनी चाहिए ताकि वे गलत मार्ग पर आगे ना निकल जाएँ. विदेशों ने कभी हमारी संस्कृति में जीवन नहीं बिताया है इसलिए उनके उदाहरण कि हम मात्र चाबुक इस्तेमाल कर सकते हैं जबकि हमारी संस्कृति से निकल कर कोई उनकी ऊँचाइयों या गर्त तक पहुंचेगा ऐसा बहुत संभव नहीं लगता.धन्यवाद.

akraktale के द्वारा
March 10, 2012

फेर में मिलाएं को (फेर में महिलायें) पढ़ें.

shashibhushan1959 के द्वारा
March 10, 2012

आदरणीय मीनू जी, सादर ! आप प्रबुद्ध महिलाओं की प्रतिक्रया पाकर मुझे लगने लगा है कि मैं जो बात कहना चाह रहा हूँ, वह कहने में थोड़ी-बहुत सफलता मिली है ! घर में, समाज में, देश में, दुनिया में, सामजिक और राजनीतिक रूप से स्त्री और पुरुष एक सामान हैं ! हर क्षेत्र में महिलाओं कि भागीदारी सामान है ! स्त्री हो या पुरुष, अगर उसमें प्रतिभा है तो उसे कोई रोक नहीं सकता ! तो फिर ये दीन-हीन, अबला, शोषिता आदि विशेषणों का प्रयोग क्यों किया जा रहा है ? पूर्वकाल से अबतक प्रतिभाशील नारियों ने अनेक क्षेत्रों में अपनी सफलता का झंडा बुलंद किया है ! ये कुछ स्वार्थी राजनितिक और व्यापारी तत्व हैं जो इसकी आड़ में अपना स्वार्थ सिद्ध करने के लिए इस मुद्दे को उत्तेजनात्मक रूप देकर अपना स्वार्थ सिद्ध करने कि जुगत में लगे हैं ! सभी लोगों को इस विषय पर गंभीरतापूर्वक मनन करना चाहिए ! आज महिलायें अपने को असुरक्षित महसूस करती हैं तो क्यों ? क्या वजह है ? मानसिक स्थिति, शारीरिक स्थिति, वेश-भूषा, रहन-सहन ……….. आखिर कारण क्या है ? उसका निदान क्या है ? आप सब लोग इसपर चिंतन करें ! अपने घर कि नीतियों का निर्धारण हम स्वयं करेंगे या बाहरी तत्वों द्वारा किये जा रहे दुष्प्रचारों से प्रभावित होंगे ? सधन्यवाद !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 10, 2012

आदरणीय जवाहर भाई, सादर ! इस मुद्दे पर बहुत गंभीरता से सभी को विचार करना चाहिए ! क्या जो हो रहा है वह ठीक है ? नारी स्वतन्त्रता और नारी सशक्तिकरण की आड़ में उछ्रिन्खलता और उत्तेजना का जो बीज बोया जा रहा है, वह हमारे समाज को किस दिशा में ले जाएगा ? स्वाभिमान बहुत अच्छी चीज है, स्वाभिमानी सबको होना चाहिए, पर घमंड अच्छी चीज नहीं है ! यद्यपि की दोनों में बहुत महीन अंतर होता है ! स्वाभिमान सौम्य और दृढ़ होता है, घमंड उद्धत और निरंकुश होता है ! एक निर्माण करेगा, दूसरा विध्वंश का कारण होगा ! सधन्यवाद !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 10, 2012

आदरणीय बी.बी. जी, सादर ! समर्थन भरी प्रतिक्रया के लिए धन्यवाद !

shashibhushan1959 के द्वारा
March 11, 2012

आदरणीय गौरव जी, सादर ! वैचारिक समर्थन एवं प्रतिक्रया के लिए आभार !


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