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फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे, निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !

Posted On: 17 Oct, 2012 Others में

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नियति ने चली चाल इतनी भयानक,
थे ढीले जो फन्दे, कसे जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड़ में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !
.
चढ़ा है नशा मिल गया जो सिंहासन,
न सोचा था ऐसे भँवर में पड़ेंगे !
बपौती समझ कुर्सियों से हैं चिपके,
न सोचा था इतनी बेशर्मी करेंगे !
.
बिना डोर की बन गए हैं तिलंगी,
दिशाहीन होकर उड़े जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !
———–
रानी के दामाद की चाटुकारी में,
सारे नियम – कायदे तोड़ डाले !
थू-थू करे सारी जनता भले ही,
बने आगे बढ़-बढ़ के सब उसके साले !
.
न आती इन्हें शर्म अपने किये पर,
गज़ब बेहया हैं, हँसे जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !
————
भरी इनकी हाँडी, किये पाप इतने,
लबालब हुआ अब छलकने लगा है !
ये खुजला रहे पीठ आपस में मिलकर,
मुखौटा सभी का उतरने लगा है !
.
जनता ने अपनी हिलाई जो चुटकी,
तो खटमल के जैसे पिसे जा रहे हैं !
फँसे ऐसे कीचड में गदहे बेचारे,
निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं !

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51 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Trinity के द्वारा
October 17, 2016

Slam dunkin like Shaquille O’Neal, if he wrote invmoratife articles.

Narain Gaur के द्वारा
October 27, 2012

निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं! और इनके किये सामने आ रहे है ये खुजला रहे पीठ आपस में मिलकर, अजब सी चुभन से तिलमिला रहे है, निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं-

Bhagwan Babu के द्वारा
October 25, 2012
rahulpriyadarshi के द्वारा
October 19, 2012

आदरणीय शशिभूषण जी,नमस्कार,बहुत सटीक और मन को भाती रचना,ये गधे,खच्चर सब के दिन अब लड़ने वाले हैं,पाप का घड़ा एक न एक दिन तो फूटना ही है और अभी तो लबालब इतना भर चुका है कि कितना भी संभालो,कही न कही से बहने ही लगता है,कीचड में धन्स्कार ही इनका आस्तित्व खो जाये यही बेहतर होगा. :)

Anil "Pandit Sameer Khan" के द्वारा
October 19, 2012

आदरणीय शशिभूषण जी, हमेशा की तरह लाजवाब कविता, किन्तु इसकी भाषा शैली और भी गज़ब है! बेहतरीन कटाक्ष आपकी कविताओं को पढ़कर लगता है की आप कवि सम्मेलनों में भी जाते होंगे…क्या ऐसा है? यदि है तो आप कहाँ-कहाँ जाते हैं!

AJAY KUMAR CHAUDHARY के द्वारा
October 19, 2012

शशि भूषण जी इस बार आपने करारा व्यंगा कसा है… नियति ने चली चाल इतनी भयानक, थे ढीले जो फन्दे, कसे जा रहे हैं ! उम्दा पंक्तियाँ. साधुवाद!

Santlal Karun के द्वारा
October 19, 2012

आदरणीय शशिभूषण जी, वर्तमान भारतीय राजनेताओं और उनकी प्रतिकूल परिस्थितियों पर चुटकी लेता यह गीत भले ही कुछ पंक्तियों में सिमट गया है और छोटा है, किन्तु यह अपने आप में पिछले लगभग दो दशकों के भारतीय नेताओं के कालिख पुते कुर्सी-कर्म की व्यंग्यात्मक क्रिया-कर्म करता है; हार्दिक साधुवाद व सद्भावनाएँ !

NIKHIL PANDEY के द्वारा
October 19, 2012

सर प्रणाम स्वीकार करे…. एक लाईन में कहू तो धो डाला .. और क्या जबरदस्त अंदाज में धोया है…

nishamittal के द्वारा
October 19, 2012

शशि भूषण जी बहुत प्रभावी विचारों से पूर्ण रचना पर बधाई आपको. भरी इनकी हाँडी, किये पाप इतने, लबालब हुआ अब छलकने लगा है ! ये खुजला रहे पीठ आपस में मिलकर, मुखौटा सभी का उतरने लगा है !

yogi sarswat के द्वारा
October 19, 2012

रानी के दामाद की चाटुकारी में, सारे नियम – कायदे तोड़ डाले ! थू-थू करे सारी जनता भले ही, बने आगे बढ़-बढ़ के सब उसके साले ! वही जोश , वही जूनून , वही तीखे तेवर ! गज़ब का लिखा है आदरणीय श्री शशिभूषण जी ! आप आज के दिनकर हैं ! उम्मीद यही की आप हमेशा यूँ ही लिखते रहे , समाज और देश आपकी बात सुन रहा है !

Acharya Vijay Gunjan के द्वारा
October 18, 2012

बिना डोर की बन गए हैं तिलंगी , दिशाहीन होकर उड़े जा रहे हैं !……. इसी तरह रचनान्तर्गत सारी की सारी पंक्तियाँ तीखे व्यंग्य की बेजोड़ मिशाल ! आदरणीय बड़े भाई शशिभूषण जी ! सादर नमन ! पुनश्च !!

ANAND PRAVIN के द्वारा
October 18, 2012

आदरणीय सर, सादर प्रणाम ऐसा दौर चल परा है सर जिसमें इनकी टोपी सर से बार बार सड़क जा रही है…………. जीजाजी को बचाने के लिए तो सालों को आगे आना ही था……..आखिर स्वामिभक्ति जो दिखानी है माँ के दरबार में…………तभी तो मेवा मिलेगा…………राईट टू करप्सन वाला सुन्दर व्यंग के लिए बधाई सर………..

munish के द्वारा
October 18, 2012

आदरणीय शशि भूषन जी अब गधों से उम्मीद भी क्या कर सकते हैं सत्य वचन

rekhafbd के द्वारा
October 18, 2012

आदरणीय शशि जी रानी के दामाद की चाटुकारी में, सारे नियम – कायदे तोड़ डाले ! थू-थू करे सारी जनता भले ही, बने आगे बढ़-बढ़ के सब उसके साले !,बहुत खूब ,बढ़िया प्रस्तुति,बधाई

surendr shukl bhramar5 के द्वारा
October 18, 2012

भरी इनकी हाँडी, किये पाप इतने, लबालब हुआ अब छलकने लगा है ! ये खुजला रहे पीठ आपस में मिलकर, मुखौटा सभी का उतरने लगा है ! इन को बचाने के लिए भी जाओ भी भैया जी तो दुलत्ती मार देते हैं गले में रस्सी बाँधने दें तो तब तो इन गधों को कोई बचाए न ? खूब सूरत थप्पड़ मारती रचना कान हों तो सुने न ये … भ्रमर ५

bhanuprakashsharma के द्वारा
October 18, 2012

सुंदर अभिव्यक्ति, बधाई। 

October 18, 2012

. चढ़ा है नशा मिल गया जो सिंहासन, न सोचा था ऐसे भँवर में पड़ेंगे ! बपौती समझ कुर्सियों से हैं चिपके, न सोचा था इतनी बेशर्मी करेंगे ,,,,,,,,,बहुत ही अच्छी प्रस्तुति के लिये आभार ,

jlsingh के द्वारा
October 18, 2012

न आती इन्हें शर्म अपने किये पर, गज़ब बेहया हैं, हँसे जा रहे हैं ! फँसे ऐसे कीचड में गदहे बेचारे, निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं ! अब नाली के कीड़े उन्हें खा रहे हैं! आदरणीय महोदय, सादर अभिवादन! यहाँ बुजुर्ग महोदय, धीरे से मुस्का रहे हैं!

akraktale के द्वारा
October 17, 2012

न आती इन्हें शर्म अपने किये पर, गज़ब बेहया हैं, हँसे जा रहे हैं ! फँसे ऐसे कीचड में गदहे बेचारे, निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं ! वाह! बहुत करारी मार. सुन्दर रचना हार्दिक बधाई स्वीकारें आदरणीय शशिभूषण जी.

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
October 17, 2012

आदरणीय भाई जी, सादर सस्नेह अब इनका दोष काहे भाई, जब ये आदमी ही नहीं हैं. सच ही तो कहा आपने. बधाई.

alkargupta1 के द्वारा
October 17, 2012

आदरणीय शशिभूषण जी , बहुत ही यथार्थ चित्रण किया है जिसकी जीतनी भी प्रशंसा की जाये उतनी कम ही है…..इन्हें अपने किये पर कोई शर्म लिहाज़ ही नहीं है …’गज़ब बेहया हैं, हँसे जा रहे हैं ..’ खरी बात कही है आपने अप्रतिम कृति के लिए बधाई नवरात्रि की हार्दिक मंगलकामनाएं !!

sudhajaiswal के द्वारा
October 17, 2012

आदरणीय शशि जी, सादर अभिवादन, गर्त में चले जायेंगे ये बेशर्म नेता लाख फजीहत क्यूँ न हो जाये इनकी पर कुर्सी का मोह भला कैसे छोड़ दे| बहुत अच्छी प्रस्तुति, बधाई|

October 17, 2012

डॉ. साहब सादर नमस्कार, बहुत दिनों के बाद मंच पर लौटने के बाद इस रचना को पढ़ने के बाद सुखद अनुभूति हो रही है। काफी देर तक गुनगुनाता रहा है इस सुंदर गीत को…..बहुत ही प्रवाह युक्त और समसामयिक घटना पर करारा कटाक्ष करती हुई रचना प्रशतुत करने के लिए आपको बहुत बहुत बधाई। डोर की बन गए हैं तिलंगी, दिशाहीन होकर उड़े जा रहे हैं ! फँसे ऐसे कीचड में गदहे बेचारे, निकलने के बदले धँसे जा रहे हैं ….ग़ज़ब की पंक्तियाँ ….वाह वाह ……वाह

MAHIMA SHREE के द्वारा
October 17, 2012

चढ़ा है नशा मिल गया जो सिंहासन, न सोचा था ऐसे भँवर में पड़ेंगे ! बपौती समझ कुर्सियों से हैं चिपके, न सोचा था इतनी बेशर्मी करेंगे ! आदरणीय सर सादर नमस्कार ..क्या बात है .. आपने तो इनकी क्या खूब लगायी है …. एक बार फिर जोरदार अंदाज में .लाजवाब प्रस्तुति … बस ये बात उन बेशर्मो तक भी पहुच जाए …. बहुत -२ बधाई

Rajesh Dubey के द्वारा
October 17, 2012

बपौती समझ कर कुर्सी के गधे वास्तव में कीचड़ में धसे जा रहे हैं. जनता की जागरूकता इन्हें कहीं की नहीं छोड़ेगी. रानी के दामाद के चाटुकार सलाखों में कैद होंगे.हर बार की तरह इस बार भी सुन्दर कविता के लिए बधाई.

ashishgonda के द्वारा
October 17, 2012

आदरणीय! सादर चरणस्पर्श, वर्तमान भारत का सीधा शब्दों में चित्रण देख रहा हूँ. बहुत ही सुन्दर भावना जो आपकी काव्य-प्रतिभा झलक रही है. प्रणाम.

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

मान्यवर आशीष जी, सादर ! मेरी रचना की सराहना के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय राजेश भाई, सादर ! सचमुच ये गधे अपने ही बनाए दलदल में फंसकर अपना अंत करेंगे ! समय भी नजदीक आता जा रहा है ! हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय महिमा जी, सादर ! सोये हुए को जगाया जाता है, पर सोने का नाटक करने वाले को ऐसे ही जगाया जा सकता है ! वे भी अपने परिणाम से अनजान नहीं हैं ! हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय डाक्टर साहब, सादर ! आपकी स्नेह भरी प्रोत्साहित करती प्रतिक्रिया के शब्द एक नए जोश का संचार कर देते हैं ! हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय सुधा जी, सादर ! इनका अंत तो निकट आ ही गया है, पर ये उसे स्वीकार करना नहीं चाहते ! प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय अलका जी, सादर ! सचमुच इन बेशर्मों की चमड़ी बहुत मोटी है ! स्नेह भरे आशीर्वचनों के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय प्रदीप भैया, सादर ! ठीक कहा आपने, ये आदमी हैं ही नहीं ! जानवरों में भी सबसे निकृष्ट जानवर हैं ! आशीर्वचनों के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय अशोक भाई, सादर ! जिस दिन ये सब तिहाड़ पहुचेंगे, उस दिन वास्तविक दशहरा मनेगा ! हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय जवाहर भाई, सादर ! बुजुर्ग महोदय “दूसरी” के चक्कर में “पहली” के साथ केवल रस्म अदायगी कर रहे हैं ! डर के मारे उनसे सीधे तो नहीं कह सकता न ! हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय डाक्टर साहब, सादर ! स्नेह भरे आशीर्वचनों के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय भानु जी, सादर ! प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय भ्रमर जी, सादर ! आनेवाले समय में ये लंगड़े होने वाले हैं ! बहुत दुलत्ती मार ली, अब जनता के दुलत्ती मारने का समय आ रहा है ! हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय रेखा जी,. सादर ! सराहना और स्नेह भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय मुनीश जी, सादर ! ठीक ही कहा आपने, इनसे कोई उम्मीद करना ही व्यर्थ है ! हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

मान्यवर आनंद जी, सादर ! अब तो इनकी माँ की भी ऐसी तैसी होने वाली है ! बस पर्दा उठने ही वाला है ! खेल शुरू होने ही वाला है ! हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय आचार्य जी, सादर ! आपके स्नेह भरे उद्गारों के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय योगेन जी, सादर ! स्नेह भरे उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार ! “दिनकर” जी तेजोमय दिनकर थे, मैं दीपक भी बन सका तो मेरा अहोभाग्य !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय निशा जी, सादर ! स्नेह भरे आशीर्वचनों के लिए बहुत-बहुत हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय निखिल जी, सादर ! क्या खूब कहा आपने…… धो डाला ! इतनी धुलाई के बाद भी ये साफ़ न हों तो फिर मुंगरी से पीट-पीट कर धोना पडेगा ! जैसे धोबी धोते हैं ! मजेदार प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय संतलाल जी, सादर ! सम्पूर्ण देश राम नाम सत्य बोल रहा है और हम रचनाकार लोग अपनी रचनाओं से इनका क्रिया-कर्म कर रहे हैं ! उत्साहवर्धन एवं स्नेह के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय अजय जी, सादर ! इनकी चमड़ी इतनी मोटी है कि अब इससे भी करारा वार करना पडेगा ! सामूहिक ! प्रातक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय अनिल जी, सादर ! मैं एक प्रोफेशनल ग्राफिक डिजाईनर हूँ ! जब मेरे काव्यगुरू आचार्य गणेश दत्त किरण जीवित थे, तो उनके साथ एक बार कवि सम्मलेन में गया था ! दुबारा जाने की इच्छा नहीं हुई ! बस जागरण मंच द्वारा ही जागृत करने की कोशिश करता रहता हूँ ! उत्साहवर्धन एवं प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 21, 2012

आदरणीय राहुल जी, सादर ! ठीक कहा आपने, अब इनके पापो का घडा अनियंत्रित होकर उलटने ही वाला है ! जोश भरी प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 27, 2012

आदरणीय भगवान् जी, सादर ! उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
October 27, 2012

आदरणीय नारायण जी, सादर ! “”ये खुजला रहे पीठ आपस में मिलकर, अजब सी चुभन से तिलमिला रहे है,”" अब तो स्थिति यह हो गई है कि ये आपस में भौंक भौंक कर लड़ना शुरू कर चुके हैं ! हार्दिक आभार !


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