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क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ?

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कोने में बैठा लोकतन्त्र, लज्जित नयनों से देख रहा !
दे रहा चुनौती ताल ठोक, नापाक “पाक” अभिमानी है !
बेटे का सर ले गया काट, तुम बने नपुंसक देख रहे,
क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ?
.
लाचार हुए हो क्यों इतने ? क्योंकर इतनी बेशर्मी है ?
चुप राजमहल में बैठे हो, जब सीमा पर सरगर्मी है !
अब करना और भरोसा इनपर, बहुत बड़ी नादानी है,
क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ?
.
ललकार रहा है बार-बार, माता का आँचल खींच रहा,
चुपके से खूनी हाथ बढ़ा, गर्दन हम सब की भींच रहा !
चाहे जितना तुम समझाओ, करता अपनी मनमानी है,
क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ?
.
चूहे सा बिल में घुस जाओ, कुछ तुमसे अगर नहीं होता,
चुटकी भर शर्म तुम्हें होती, तो क्यों सारा भारत रोता !
अब तो लगता है कभी-कभी, यह तुम सब की शैतानी है,
क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ?
.
पल्लूसेवी वीर गुलामों, अगर नहीं कुछ कर सकते,
जनता सब सुलझा लेगी, पीछे हट कर हो जाओ खड़े !
पलभर में फिजाँ बदल देंगे, हम ऐसे हिन्दुस्तानी हैं,
क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ?

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29 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

sinsera के द्वारा
February 2, 2013

आदरणीय शशिभूषण जी नमस्कार, रोमांचक रचना परन्तु पढने से बहुत दिनों तक वंचित रही…कारण वही..आपने अपने ब्लॉग पर लॉक लगा रखा है…कृपया इस दुर्गम मार्ग को आसान बनाइये..

nishamittal के द्वारा
January 18, 2013

जोशीले आह्वान से पूर्ण रचना पर बधाई आपको.बड़ी कठिनाई से कमेन्ट हो पाया.

Rajesh Dubey के द्वारा
January 18, 2013

देश को समर्पित तथा मन में जोश भरने वाली कविता के लिए धन्यवाद.

yogi sarswat के द्वारा
January 18, 2013

ललकार रहा है बार-बार, माता का आँचल खींच रहा, चुपके से खूनी हाथ बढ़ा, गर्दन हम सब की भींच रहा ! चाहे जितना तुम समझाओ, करता अपनी मनमानी है, क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ? वीर बालकों का ये देश इतना सहनशील कैसे हो गया की बेटे की गर्दन तक काट ले जाने पर भी सरकारों का खून नहीं खौलता ? खुलेगा भी कैसे , ठंडा जो हो गया है ! ये तो अच्छा है की हमारे जवानों का खून गर्म है , अन्यथा तो ये जाने क्या कर देते ?

jlsingh के द्वारा
January 18, 2013

आदरणीय कविश्रेष्ठ, सादर अभिवादन! आपकी जोश जगाती कविता से शायद शायद हमारे शासनाध्यक्षों का खून थोडा गरम हुआ और पाकिस्तान का रुख थोड़ा नरम हुआ है! अब तो लगता है कभी-कभी, यह तुम सब की शैतानी है, क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ? इसमे कोई दो राय नहीं की ये दोनों देश एक दूसरे का भय दिखाकर आमजनों के ध्यान को भटकना चाहते हैं ..यह धारण बलवती होती दीखती है! कृपया अपना मेल भी देख ले जो मैंने आपको भेज है!

Mohd Haneef "Ankur" के द्वारा
January 17, 2013

गुरु जी, सादर प्रणाम! रग रग में जोश भर देने वाली रचना…… सही कहा आपने, जनता को आगे आने का मौका दिया जाना चाहिए. जनता सब सुलझा लेगी.

seemakanwal के द्वारा
January 17, 2013

ओज पूर्ण रचना .हार्दिक आभार . आदरणीय शशी जी नमस्कार आप की प्रतिक्रिया के पते पे क्लिक करने से भोजपुरी बयार ब्लाग आता है ये तो आज कवर पे देख कर आप की कविता पढ़ पाई .

vinitashukla के द्वारा
January 17, 2013

“लाचार हुए हो क्यों इतने ? क्योंकर इतनी बेशर्मी है ? चुप राजमहल में बैठे हो, जब सीमा पर सरगर्मी है ! अब करना और भरोसा इनपर, बहुत बड़ी नादानी है, क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ?” समयोचित, ओज से भरी हुई ललकार. काश इन नेताओं के कानों पर भी जूं रेंगती! सुन्दर, समसामयिक रचना को साझा करने हेतु आभार; आदरणीय शशिभूषण जी.

bhanuprakashsharma के द्वारा
January 17, 2013

आदरणीय शशि जी,  सुंदर रचना। साथ ही स्वाभिमान को ललकारती यह रचना। काश हमारे देश के नेता भी इस ओर सोचते और दुश्मन को करारा जवाब देने का निर्णय लेते। वह हमले किए जाता है और यहां बयान देने से ही फुर्सत नहीं रहती।  

akraktale के द्वारा
January 16, 2013

आदरणीय शशिभूषण जी सादर, बहुत सुन्दर ललकार और जोश भरी रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकारें.  क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ?………वाह! जितनी तारीफ़ करूँ कम है. मगर खुद का स्वाभिमान खो चुके ये नेतागण क्या देश के स्वाभिमान के बारे में कुछ सोचेंगे ऐसा लगता तो नहीं. 

Santlal Karun के द्वारा
January 16, 2013

आदरणीय शशिभूषण जी, शहीद सैनिक के सर का मूल्य,शासन-सत्ता की नाकामी और वर्तमान राष्ट्र-चिंता का प्रबल ध्वनन तथा सधा हुआ छंदोबद्ध गीत; हार्दिक साधुवाद एवं सद्भावनाएँ !

January 16, 2013

सादर चरण स्पर्श, पिता श्री! चूहे सा बिल में घुस जाओ, कुछ तुमसे अगर नहीं होता, चुटकी भर शर्म तुम्हें होती, तो क्यों सारा भारत रोता ! अब तो लगता है कभी-कभी, यह तुम सब की शैतानी है, क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ……………आपकी इस रचना से आने वाली ग्रीष्म ऋतू की तपिश साफ़ झलक रही है………………….

PRADEEP KUSHWAHA के द्वारा
January 16, 2013

पल्लूसेवी वीर गुलामों, अगर नहीं कुछ कर सकते, जनता सब सुलझा लेगी, पीछे हट कर हो जाओ खड़े ! पलभर में फिजाँ बदल देंगे, हम ऐसे हिन्दुस्तानी हैं, क्यों आग नहीं लगती दिल में, क्या खून हो गया पानी है ? आदरणीय अनुज श्री सादर सस्नेह यद्दपि मेरा काफी खून हम्रेज के कारण जाया हो चूका है अभी, पर में सीमा पर जाने को हूँ तैयार बधाई.

babadineshsingh के द्वारा
January 16, 2013

गाँधी जी को अंग्रेजो ने दी udhar ki आजादी. netaa लीडर मगन सभी है bilakh rahi है आबादी.देश भक्त का स्वांग रचा के भारत के दो तुक किये.गांदी जी ने barabaadi के मेरे saath सुलूक किये. माँ भारत का bchchaa 2 मिटने को तिएयर खड़ा. अपना हाथ खुद सर apne पर नंगी liye कतार खड़ा. sar है कश्मीर भारत का jispar marte जेहादी. शीश काट क्र भारत माँ का चाह रहे है बर्बादी. kyo तुम मूक बने netaon aage क्या कर्वावोगे. शीश काट kar भारत माँ का काया हिटलरी दिखाओगे. जब भारत को मिली आजादी नेहरू जी pardhaan हुए. जैसा चाह रहे थे बेटन वेसे ही फरमान किये. nehru जी ने निज kursi hit सव्तान्तार्ता kurwaan किया. भगत सिंह aajad आदि का बेमतलब बलिदान हुवा.ye मेरे भारत के subhas इतने दिन किसे मोन रहे. अन्याय हो रहा भारत पर इतने दिन किसे घुपे रहे. हम बन dinesh भारत maa के आये तेरे फरियादी हम देने को तेइयार लहू दे दो अब हमको आजादी.

mayankkumar के द्वारा
January 16, 2013

आपके लेखन में वाकई सार्थकता, रोचकता, व पठनीयता है। ऐसे ही पाठकों का मनोरंजन व ज्ञनार्जन में सहायता प्रदान करते रहें।

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय मयंक जी, सादर ! आपकी सहृदयता भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय दिनेश जी, सादर ! आपकी काव्यमय वीरोचित प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय प्रदीप भैया, सादर ! इस वृद्धावस्था में ऐसी जोश भरी टिपण्णी के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय अनिल जी, सादर ! बहुत कुछ उथल-पुथल होना है ! हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय करुण जी, सादर ! देश, परिवर्तन की प्रतीक्षा में है ! परिवर्तन, अनुकूल समय की प्रतीक्षा में है ! सारगर्भित प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय अशोक जी, सादर ! जोश भरती एवं उत्साह जगाती प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय भानु जी, सादर ! अब तो ऐसा समय आयेगा जब इन नेताओं को केवल सोचने का ही काम रहेगा, जब ये सब के सब तिहाड़ में इकठ्ठे बंद होंगे ! सादर

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय विनीता जी, सादर ! आपके आशीर्वचनों के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय सीमा जी, सादर ! सहृदय प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय अंकुर जी, सादर ! प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय जवाहर भाई, सादर ! इस समय तो ऐसा लग रहा है की इन नेताओं की एक अलग प्रजाति ही तैयार हो गई है, जो अपने को हम सब से भिन्न और श्रेष्ठ समझने लगी है ! पर वास्तव में यह प्रजाति हद दर्जे की कायर, स्वार्थी और धोखेबाज हो गई है ! पर समय अच्छे-अच्छे को ठीक कर देता है ! ये भी होंगे ! पहला मेल खुला ही नहीं, मैं उसे पढ़ ही नहीं पाया हूँ ! करप्ट फ़ाइल बता रहा है ! अगर दुबारा मेल कर दें तो बहुत अच्छा हो ! सादर !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय योगेन जी, सादर ! ये कायर नेता देश की प्रतिष्ठा मिटटी में मिलाने पर उतारू हैं ! ये तो अच्छा है की “”हमारे जवानों का खून गर्म है , अन्यथा तो ये नेता जाने क्या कर देते ?”" ठीक कहा आपने ! जोश व उत्साह भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार ! सादर !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय राजेश भाई, सादर ! जोश व उत्साह भरी प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार ! सादर !

shashibhushan1959 के द्वारा
January 26, 2013

आदरणीय निशा जी, सादर ! प्रतिक्रया के लिए हार्दिक आभार !


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